Estd: 7th July 1952
स्थापना 7 जुलाई 1952
1919-1995
हमारी संस्थापिका - गीता बजाज - हमारी "बड़ी दीदी"

जीवन संस्कारों की झांकी
( बाल किरण के 1962 संस्करण में प्रकाशित गीता दीदी की रचना )
लीजिये है यह
हमारी कहानी
हमारी ज़बानी...
चाहते रहे यह
आपके ध्यान में
समाज के ज्ञान में
इसी के लिए यह
छोटा-सा आयोजन
स्नेह का आमंत्रण
आइये हमें सब उपकृत कीजिये -
फूल में पंखुरी-सा साधुवाद लीजिये !
हमारी कहानी :
इधर यह रामू है, श्यामू है, घिस्या औ ग्यारसा है,
दूर से आया कमल है, माधव है, विनोद है,
नन्हें नन्हें बाल...
इधर यह रामी है, श्यामी है, घीसी औ ग्यारसी है,
दूर से आई रेखा है, रुक्मिणी है, रेणुका माधुरी है,
नन्ही नन्ही बालाएं...
x x x
उधर सूनी झोपड़ियां, तंग कुछ कोटड़ीयां,
और घर के मां-बाप , भाई-भौजाई,
गये हैं नौकरी पर, मजूरी पर, जी-हजूरी पर..
माली, धोबी, धाणका, बलाई अधिक,
कुछ ब्राह्मण, बनिये, ठाकुर, हैं जाति जाति के,
कुछ यहीं के, कुछ पुरुषार्थी पीड़ित ,
धर्म, जाति के अनेक, किन्तु सब गरीब की पांति के,
आकाश के डाले, धरती के झेले,
नन्हों की मण्डली, उन्मनी अकेले,
हँसते कभी, पर, अधिक रोते-झगड़ते,
कुछ न मिले, बस, धूल में धूल से खेले,
इधर पड़े, उधर रोये,
जीवन में मानो खोये-खोये
दुनिया कहती “गंदे हैं
बुद्धि तो कौन जाने,
जीवन में मंदे हैं ” .
इसलिये चारों ओर दुत्कार, फटकार,
मानो मिला यही इन्हें जीवन का संस्कार,
बाल-गोपाल का,
कैसा कडुवा यह ,
प्यार और सत्कार ??
हृदय में ठेस लगी, मन में इक टीस उठी,
देख देख हालत यह, रही मति मेरी ठगी ,
क्या दूं ? कितना दूं ? कहा से दूं ?
कौड़ी भी नहीं जो इन मुन्नों को,
धूल के रतन इन नौ - निहालों को,
और कुछ नहीं तो मिट्टी की घोड़ी दूं ?
कही से लाकर खिलौनों की जोड़ी दूं ?
x x x
और सोचा क्यों न ये,
मेरे हृदय का स्नेह लें,
टूटा मेरा गेह लें,
कुछ पढ़ें, कुछ लिखें, कुछ खेलें,
यों सच्चे संस्कार लें…
रूठा जो आज तक,
मन का वह प्यार लें,
जीवन रस-धार लें,
यों लगी सरस्वती की,
छोटी फुलवारी यह !
पांच से पच्चीस और,
पच्चीस से पचास हुए
यों साल दर-साल दस साल में.
आज यह गोप – गोपी, तीन सौ पचास हुए !!
x x x
साध है – मैं ग़रीब , ये ग़रीब, मिलें ग़रीब से ग़रीब,
ग़रीबी से लड़ें अब,
शिक्षा – संस्कार लें, बापू के देश में बाबू तो बनें न,
श्रम-साधक बनें सब...
तन मेरा, मन मेरा, धन जन-जन का है,
श्रम सहयोगियों का, काम कुछ बनता है,
साध बड़ी, किन्तु है, काम की अगाध झड़ी,
उत्साह है, माना है, परीक्षा होगी कड़ी...
सालाना जलसे पर लाये है भेंट कुछ,
नन्हें मुन्ना सब, बिठा लिया ढब कुछ,
इनकी प्रगति की,
इनकी सुगति की
नये कुछ जीवन ,
औ’ नई सुमति की
जीवन संस्कार की ,
नूतन झंकार की
देखिये झांकी अब...
अभिनव यह झांकी सब
स्वागत हे बंधुजन ! स्वागत हे भगिनिगण !!











