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हमारे सफ़र के कुछ यादगार पड़ाव...

हमारा पहला वार्षिकोत्सव...

जब स्वर्गीय गीता बजाज ने जुलाई, 1952 में स्कूल शुरू किया, तो उन्होंने इसका नाम "बाल मंदिर हैप्पी स्कूल" रखा.  जल्द ही, पहले ही साल में, जिन 5 बच्चों के साथ उन्होंने इसे शुरू किया था, उनकी संख्या बढ़कर लगभग सौ हो गई, जो बहुत उत्साहित करने वाली बात थी और इससे उनका और  उनके साथियों का हौसला भी बढ़ा...

जब स्कूल का पहला वार्षिकोत्सव मनाने का समय आया, तो उन्हें उस अवसर के लिए  मुख्य अतिथि के तौर पर जयपुर की महारानी, ​​श्रीमती गायत्री देवी को आमंत्रित , जिन्होंने बाल शिक्षा के इस महान कार्य में हमेशा उनका उत्साहवर्धन किया था.  यह सच में महारानी जी ही थीं, जो समाज कल्याण बोर्ड की  अध्यक्ष (गीता जी बोर्ड की सचिव थीं )  तथा  जयपुर से सांसद भी थीं, जिन्होंने उन्हें मोती डूंगरी इलाके में 100 वर्ग मीटर ज़मीन दिलाने में मदद की थी.

महारानी गायत्री देवी ने न सिर्फ उनका  निवेदन  स्वीकार किया, बल्कि वे आईं और छोटे से  कार्यक्रम के  अंत में,  बाल मंदिर को 5 हज़ार रुपये – जो उस समय बहुत बड़ी रकम थी - का  व्यक्तिगत अनुदान देने की भी घोषणा की !

हमारे सफ़र के कुछ यादगार पड़ाव...

संस्थान का स्वर्ण जयंती समारोह

बाल मंदिर संस्थान ने 4 अक्टूबर, 2004 को अपनी स्वर्ण जयंती मनाई.  संस्थान परिसर में खुले मंच और प्रार्थना स्थल पर एक शानदार कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें कई विशिष्ट  मेहमान मौजूद थे.  इस मौके पर मुख्य अतिथि भारत के तत्कालीन उपराष्ट्रपति महामहिम भैरों सिंह शेखावत थे.  अन्य अतिथियों में राजस्थान के राज्यपाल श्री मदन लाल खुराना शामिल थे, और कार्यक्रम की अध्यक्षता राज्य के शिक्षा मंत्री श्री घनश्याम तिवारी ने की.

इस मौके का मुख्य आकर्षण एक नृत्य-नाटिका थी, जिसमें हमारी स्वर्गीय गीता बजाज के जन्म 19 मार्च, 1919 से लेकर 3 अगस्त, 1995 को 76 साल की उम्र में उनके महापरिनिर्वाण तक उन की पूरी जीवन यात्रा दिखाई गई.  इसे सीनियर सेकेंडरी स्कूल और ब.एड. कॉलेज के छात्र- छात्राओं ने मिलकर बहुत ही जीवंत रूप से प्रस्तुत किया.

 

सभा को संबोधित करते हुए श्री शेखावत ने श्रीमती गीता बजाज के साथ अपने लंबे संबंधों को याद किया और कई दिलचस्प घटनाएँ बताई,  और यह भी बताया कि कैसे वे "अपने बच्चों" के लिए सरकारी मदद की ज़रूरत पड़ने पर “मांग” करती थीं और तब तक अड़ी रहतीं थीं जब तक उनकी मांग पूरी नहीं हो जाती थी ! उन्होंने उस समय के बारे में भी बात की जब वे पहली बार श्रीमती बजाज से मिले थे, जब उन्होंने 1957 के आम चुनावों में सीकर से  विधायक पद के लिए एक-दूसरे के  विरुद्ध चुनाव लड़ा, और राजनीतिक रूप से एक-दूसरे की विचारधारा के विरोधी होने के बावजूद उन दोनों के बीच सदा सौहार्दपूर्ण संबंध बने रहे.  

 

संस्थान अध्यक्ष श्री कोमल चंद पाटनी और इसके सचिव (गीता जी के दामाद) श्री जसदेव सिंह ने संस्थान के विकास की कहानी विस्तार से बताई, जो गीता जी द्वारा पड़ोस के  मोती डूंगरी इलाके के सबसे गरीब परिवारों के सिर्फ 5 छोटे बच्चों के साथ इसकी स्थापना के 5 दशकों  के दौरान हुआ.

हमारे सफ़र के कुछ यादगार पड़ाव...

NTPC ब्लॉक का उद्घाटन 

साल 2016 में, सरकार ने फैसला किया कि बैचलर ऑफ़ एजुकेशन (BEd) डिग्री कोर्स एक साल की जगह 2 साल का होगा, और हमें अधिक कक्षाओं और अन्य सुविधाओं की आवश्यकता पड़ी. हमने एक  नये ब्लॉक का निर्माण के लिए CSR  सहायता के लिए कई  प्रतिष्ठानों से संपर्क किया और हमें नई दिल्ली में  विद्युत् उत्पादन क्षेत्र की बड़ी कंपनी NTPC से मदद मिली, जहाँ हमारे सेक्रेटरी श्री गुरदेव सिंह ने कंपनी की शुरुआत के समय काम किया था – NTPC में वरिष्ठतम  स्तर पर उनके जान-पहचान वाले लोग थे.  NTPC ने एक नया ब्लॉक बनाने के लिए ज़रूरी ख़र्च की लगभग 70% राशि हमें देना स्वीकार किया. इस भवन का निर्माण कार्य 2017 की पहली तिमाही पूरा हो गया. NTPC की शर्तों के अनुसार इस बिल्डिंग का नाम "NTPC ब्लॉक" रखा गया और इसका डिज़ाइन और  निर्माण कार्य रिकॉर्ड 6 महीनों में पूरा हो गया.

हमने नई बिल्डिंग  के उद्घाटन  के NTPC के डायरेक्टर (प्रोजेक्ट्स) श्री अनिल कुमार झा को आमंत्रित किया, जिन्होंने हमें इस आर्थिक मदद की मंज़ूरी दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी. 9 जुलाई 2017 को गीता बजाज बाल मंदिर संस्थान के 67वें स्थापना दिवस के शुभ दिन नये भवन का उद्घाटन झा साहब के करकमलों द्वारा हुआ.  इस मौके पर हमने अपने कुछ ऐसे वरिष्ठ व्यक्तियों को भी सम्मानित किया, जिन्होंने लंबे समय तक अलग-अलग  तरह से संस्थान की सेवा की थी, साथ ही  प्रख्यात वास्तुकार श्री रवि गुप्ता को भी सम्मानित किया, जो आज हमारे संस्थान के अध्यक्ष हैं.

हमारे सफ़र के कुछ यादगार पड़ाव...

नवनिर्मित गीता गिरधर सभागार का उद्घाटन

श्रीमती गीता बजाज ने दशकों तक एक सपना देखा था कि  वे अपने  छात्र- छात्राओं के लिए  संस्थान परिसर में ही एक आधुनिक सभागार - ऑडिटोरियम - बनवाएं, और उन्होंने 1995  के मध्य तक उस समय के स्तर के  अनुरूप इसे बनवा भी लिया था, परन्तु विधि की विडम्बना थी कि इससे पहले कि भारत के राष्ट्रपति स्वर्गीय डॉ. शंकर दयाल शर्मा आकर इसका उद्घाटन करते, एक भयानक आग में पूरा  सभागार जलकर खाक हो गया.

22 साल के लंबे  अंतराल के बाद,  गीता जी के दोहित्र गुरदेव सिंह ने बाल मंदिर संस्थान की ज़िम्मेदारियां संभालीं और उसी जगह पर एक बहुत ही आधुनिक ऑडिटोरियम को फिर से बनाने का प्रोजेक्ट भी शुरू किया, जिसमें आजकल की  आवश्यकताओं के  अनुरूप सभी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध थीं.  अंततः 6 अप्रैल, 2018  के शुभ दिन जाने-माने और लोकप्रिय  नाट्य और संगीत कलाकार पद्म श्री शेखर सेन, जो कि संगीत नाटक अकादमी के  अध्यक्ष भी थे, ने एक शानदार समारोह में इस नवनिर्मित  सभागार का उद्घाटन किया.  

 

श्रीमती गीता बजाज के परिवार की इच्छा के अनुसार इसका नाम "गीता गिरधर सभागार" रखा गया – स्वर्गीय गिरधारी लाल बजाज गीता जी के पति थे, जिनकी 21 साल की कम उम्र में दुखद और असामयिक  मृत्यु ने इस वीर महिला को एक  नयी दिशा दी और इस  व्यक्तिगत दुख के  बावजूद, आने वाले दशकों में उनके भविष्य के जीवन को ढाला, जिसका जीता जागता प्रमाण आज  का  बाल मंदिर है...

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गीता बजाज का जन्म शताब्दी वर्ष (1919-20) का उद्घाटन समारोह

बाल मंदिर ने अपनी संस्थापक स्वर्गीय गीता बजाज का जन्म शताब्दी वर्ष 1919-20 में मनाया. उद्घाटन समारोह 16 जुलाई 1919 को संस्थान के 67वें स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित किया गया था. आने वाले महीनों में सालभर विभिन्न समारोह और अन्य कार्यक्रम जैसे अंतर्विद्यालय और अन्तर्महाविद्यालय नृत्य एवं नाटक प्रतियोगिताएं तथा अन्य गतिविधियां आयोजित होती रहीं.

उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि राज्य शिक्षा मंत्री श्री गोविंद सिंह डोटासरा थे, और विशेष सम्मानित अतिथि, जाने-माने न्यायविद, न्यायमूर्ति विनोद शंकर दवे थे. डोटासरा जी ने गीता जी के साथ अपने जुड़ाव के बारे में बात की, जब उनकी पत्नी बाल मंदिर में STC कोर्स में पढ़ रही थीं.  उन्होंने  बताया कि गीता दीदी सख्त अनुशासनप्रिय महिला थीं परन्तु सभी छात्रों के प्रति उनका स्नेह भी बुतना ही गहरा, और उस समय की अपनी यादें सुनाईं जब वे संस्थान के हॉस्टल में अपनी पत्नी से मिलने आते थे और अक्सर दीदी से उनका सामना हो जाता था. न्यायमूर्ति दवे ने गीता जी के समय की अपनी यादों के बारे में बात की और समाज के वंचित वर्गों के बच्चों को शिक्षित करने और राजस्थान की महिलाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए उनके आजीवन समर्पण  का ज़िक्र करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी.

इस अवसर का मुख्य आकर्षण एक खूबसूरती से कोरियोग्राफ  की गयी नृत्य-नाटिका थी, जिसमें गीता जी की जीवन यात्रा को दर्शाया गया था, शुरू में एक स्वतंत्रता सेनानी और बाद में एक शिक्षाविद् के रूप में.  संस्थान के सचिव - स्वर्गीय गीता जी के दोहित्र -  गुरदेव सिंह ने उनसे हर दिन कुछ नया सीखने के अपने अनुभव के बारे में भावुक होकर बात की.

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