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गांधी जयंती शिविर

एक अद्भुत एवं अद्वितीय परंपरा...

संस्था के जन्म से ही गांधी जयंती के अवसर पर लगभग एक सप्ताह के गांधी शिविर का आयोजन किया जाता रहा है, जिसमें सभी शिक्षक-शिक्षिकाएं एवं बालक-बालिकाएं एक सप्ताह तक विद्यालय में रहते थे.

इस शिविर में प्रातः 4.30 बजे जागरण से रात्रि 9.30 शयन करने तक गांधीमय वातावरण बना रहता था. नित्यकर्म से निवृत्त होने के बाद सर्वधर्म प्रार्थना एवं भजन-गायन होता था , तत्पश्चात प्रतिदिन प्रभातफेरी के दौरान विभिन्न धार्मिक स्थलों (मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, जैन मंदिर आदि) पर जाना, और वहां सम्बन्धित धर्म की मूल बातों एवं विशेषताओं पर संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित व्याख्यान होते. प्रभातफेरी के दौरान विभिन्न जागरण गीतों एवं व्यसन मुक्ति, स्वदेशी, गांधीवाद, सामाजिक चेतना आदि से संबंधित नारों की गूंज जहां राहगीरों को रोमांचित करती थी, वहीं आस पड़ोस की  बस्तियों के निवासियों को खिड़की-दरवाजों से झाँकने तथा घर से बाहर तक निकलने के लिए विवश कर देती थी. विद्यालय लौटने पर एक घंटा श्रमदान किया जाता था, जिसमें विद्यालय परिसर की सफाई-पुताई, बागवानी आदि जैसी गतिविधियाँ होती थीं. नाश्ते के उपरान्त गांधी दर्शन संस्थान के किसी अधिकारी, विद्वान या समाजसेवी का व्याख्यान होता था, उसके पश्चात हस्तशिल्प आदि गतिविधियाँ करवाई जाती थीं.

पूर्वाह्न 11 बजे से मध्याह्न 1 बजे तक का समय समाजपयोगी उत्पादक कार्य के लिये रहता था.

 

दोपहर में सामूहिक भोजन तथा आधा घण्टे विश्राम के बाद अपराह्न 2 बजे से 4 बजे विभिन्न अन्तर्विद्यालयी प्रतियोगिताएं तथा 4 से 6 बजे तक खेल प्रतियोगिताएं करवायी जाती थीं. इसके बाद सायं लगभग 7 बजे प्रार्थना, भजन-गायन तथा पुनः गांधी दर्शन पर व्याख्यान–यही शिविर की दिनचर्या रहती थी.

 

बाद के वर्षों में देश-काल-परिस्थितियों  के अनुरूप इस कार्यक्रम में परिवर्तन कर शिविर का समय प्रातः 9 बजे से  शाम 7 बजे तक सीमित कर दिया गया.

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